अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा / Courtesy, Lalit K Jha
अमेरिका में भारत के राजदूत विनय क्वात्रा ने प्रस्तावित 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल 2026' (FCRA बिल) की आलोचना को 'गलतफहमी' बताते हुए खारिज कर दिया है। उन्होंने उन दावों का जवाब देने के लिए 'मिथक बनाम सच्चाई' (Myth vs. Reality) का ब्योरा जारी किया है, जिनमें कहा गया था कि यह प्रस्तावित कानून धार्मिक समूहों को निशाना बनाता है या सरकार को सिविल सोसाइटी की संपत्तियों पर कब्जा करने की इजाजत देता है।
राजदूत की यह टिप्पणी अमेरिकी प्रतिनिधि राइली मूर की तीखी आलोचना के बाद आई है। मूर ने दावा किया था कि FCRA बिल ईसाइयों पर सीधा हमला है और इससे भारत सरकार को चर्चों और धार्मिक चैरिटी संस्थाओं पर कब्जा करने की इजाजत मिल जाएगी।
X (ट्विटर) पर एक थ्रेड में, क्वात्रा ने सिविल सोसाइटी, धार्मिक संगठनों और NGO की संपत्तियों पर इस कानून के असर को लेकर फैली गलतफहमियों को दूर करने के लिए "मिथक बनाम सच्चाई" का विस्तृत ब्योरा दिया।
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क्वात्रा ने लिखा कि मीडिया और सिविल सोसाइटी में प्रस्तावित 'फॉरेन कंट्रीब्यूशन (रेगुलेशन) अमेंडमेंट बिल (FCRA), 2026' को लेकर कई गलतफहमियां हैं। यहां 'मिथक बनाम सच्चाई' की जानकारी दी गई है।
इस चिंता का जवाब देते हुए कि नया कानून सिविल सोसाइटी को मिलने वाली विदेशी मदद को रोक देगा, क्वात्रा ने कहा कि सार्वजनिक और राजनीतिक क्षेत्रों में विदेशी पैसे के लेन-देन को रेगुलेट करना राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा एक संप्रभु कदम है। उन्होंने कहा कि यह दुनिया भर के कई लोकतंत्रों में आधुनिक शासन-व्यवस्था की एक स्वीकृत विशेषता है।
क्वात्रा ने बताया कि भारत में पहला FCRA कानून 1976 में आया था। 2010 में इसे एक अधिक आधुनिक ढांचे से बदल दिया गया और 2016, 2018 और 2020 में संशोधनों के जरिए इसे और मजबूत किया गया। उन्होंने कहा कि 2026 का बिल और नियम इसी दिशा में अगला कदम हैं: ज्यादा पारदर्शिता, बेहतर शासन और स्पष्ट नियम।
उन्होंने कहा कि असल बात यह है कि कानून भारतीयों को विदेशी चंदा लेने से नहीं रोकता है और न ही नियमों का पालन करने वाली सिविल सोसाइटी को बंद करता है। उन्होंने आगे कहा कि हजारों संस्थाएं FCRA के तहत रजिस्टर्ड हैं और उन्हें स्वास्थ्य, शिक्षा, आपदा राहत, रिसर्च और मानवीय कार्यों के लिए नियमित रूप से विदेशी फंड मिलता है।
There are many misunderstandings in the media and in civil society about the proposed Foreign Contribution (Regulation) Amendment Bill(FCRA), 2026.
— Amb Vinay Mohan Kwatra (@AmbVMKwatra) August 10, 2026
Here is the Myth vs. Reality check.
इस दावे पर कि FCRA ने NGO और चैरिटेबल संस्थाओं के कामकाज पर बुरा असर डाला है और नए संशोधन से भारत में उनके काम करने की क्षमता और सीमित हो जाएगी, उन्होंने कहा कि असल में भारत में विदेशी पैसे का आना कम नहीं, बल्कि बढ़ रहा है।
क्वात्रा ने कहा कि रजिस्टर्ड संस्थाओं को मिलने वाला विदेशी चंदा 2010-11 में लगभग 1.2 अरब डॉलर से बढ़कर 2024-25 में 2.67 अरब डॉलर हो गया है। भारत में 30 लाख से ज्यादा NGO हैं। इनमें से बहुत कम, यानी सिर्फ 14,450 के पास FCRA रजिस्ट्रेशन है। इस तरह, ज्यादातर सिविल सोसाइटी संस्थाएं इस कानून के दायरे से पूरी तरह बाहर हैं।
उन्होंने कहा कि FCRA किसी को भी विदेशी चंदा, रिसर्च ग्रांट या मानवीय सहायता लेने से नहीं रोकता।
पिछले हफ्ते अमेरिकी प्रतिनिधि मूर ने X पर एक पोस्ट में आरोप लगाया कि भारत का ईसाई धर्म से पुराना नाता होने के बावजूद, वहां की संसद कानून में संशोधन पर विचार कर रही है, जो ईसाइयों पर सीधा हमला है।
मूर ने लिखा कि ईसाई भारत में तब से हैं जब सेंट थॉमस द एपोस्टल ने हमारे प्रभु यीशु मसीह के पुनरुत्थान के कुछ ही दशकों बाद मालाबार तट की यात्रा की थी।
विदेशी योगदान (विनियमन) संशोधन विधेयक, 2026 का मकसद विदेशी योगदान (विनियमन) अधिनियम, 2010 में संशोधन करना है। यह अधिनियम तय करता है कि गैर-सरकारी संगठन, चैरिटेबल ट्रस्ट, शिक्षण संस्थान, धार्मिक संस्थाएं और संगठन विदेशी चंदा कैसे प्राप्त करते हैं और उसका इस्तेमाल कैसे करते हैं। मौजूदा नियमों के तहत, संगठनों को विदेशी चंदा लेने से पहले गृह मंत्रालय से रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी है। इस रजिस्ट्रेशन को हर पांच साल में रिन्यू कराना होता है।
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