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बांग्लादेश चुनाव के मद्देनजर हर हालात के लिए तैयार रहे भारत, रिपोर्ट में बड़ी चेतावनी

रिपोर्ट का निष्कर्ष है कि इन हालातों में भारत को हर विकल्प खुला रखते हुए, अपनी सुरक्षा और रणनीतिक हितों की रक्षा के लिए सतर्क और तैयार रहना होगा।

 बांग्लादेश में भारत विरोधी लहर बांग्लादेश में भारत विरोधी लहर / IANS/X/@ChiefAdviserGoB

बांग्लादेश में मोहम्मद यूनुस के नेतृत्व वाली अंतरिम सरकार के सत्ता संभालने के बाद भारत ने अपने रुख को व्यावहारिक और संतुलित तरीके से पुनः समायोजित किया है। लेकिन अब, जब पड़ोसी देश में 12 फरवरी को चुनाव होने जा रहे हैं, तो भारत को हर संभावित परिदृश्य के लिए तैयार रहना चाहिए। यह बात India Narrative में प्रकाशित एक रिपोर्ट में कही गई है।

रिपोर्ट में कहा गया है कि जैसे-जैसे चुनाव नजदीक आ रहे हैं, भारत के लिए रणनीतिक भरोसा बनाए रखना और ढाका में भारत-विरोधी प्रभावों को काउंटर करना जरूरी हो गया है। रिपोर्ट के अनुसार, नई हिंसा की लहर के बाद भारत के लिए कूटनीतिक विकल्पों की गुंजाइश लगातार कम होती जा रही है।

विश्लेषक सृजन शर्मा ने बांग्लादेश में हाल के महीनों में दिखी भारत-विरोधी लहर और इस्लामी ताकतों के उभार की ओर इशारा किया। उन्होंने कहा कि चुनाव से पहले के तीन महीनों में जमातियों द्वारा सड़कों पर हिंसा, मीडिया संस्थानों, हिंदू समुदाय और अवामी लीग कार्यालयों को निशाना बनाया जाना, 2001 के चुनावी दौर की रणनीति से मेल खाता है।

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शर्मा के अनुसार, 2001 के चुनावों से पहले भी बीएनपी-जमात गठबंधन के समर्थकों ने बड़े पैमाने पर हिंसा की थी, जिसके बाद हिंदुओं और अवामी लीग कार्यकर्ताओं पर हमले तेज हो गए थे। इसका नतीजा यह हुआ कि शेख हसीना सत्ता से बाहर हो गईं और इस्लामी ताकतों के समर्थन वाली बीएनपी सत्ता में आई।

उन्होंने लिखा कि 2001 में जमात-ए-इस्लामी, जिसके पाकिस्तान से वैचारिक संबंध रहे हैं, ने भीड़ को उकसाने और अल्पसंख्यकों व अवामी लीग के खिलाफ हिंसा में अहम भूमिका निभाई थी। बीएनपी शासन के दौरान, खासकर चुनाव के बाद, दक्षिण-पूर्वी बांग्लादेश में हिंदुओं पर हिंसा जारी रही।

रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि बीएनपी शासन के समय ULFA-1 को बांग्लादेश की धरती से भारत विरोधी गतिविधियां चलाने की छूट मिली। 2004 का चिटगांव आर्म्स हॉल इस बात का उदाहरण था कि कैसे बांग्लादेश उस दौर में भारत-विरोधी गतिविधियों का अड्डा बनता जा रहा था।

रिपोर्ट के मुताबिक, मौजूदा चुनावी माहौल में भी और ज्यादा आक्रामक भारत-विरोधी रुझान देखने को मिल रहा है, जिसमें पाकिस्तान की भूमिका अहम मानी जा रही है।
रिपोर्ट में आशंका जताई गई है कि पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी ISI छात्र नेता उस्मान बिन हादी की हत्या में शामिल हो सकती है। इसके अलावा, कुछ रिपोर्टों के अनुसार पाकिस्तान ULFA-I प्रमुख परेश बरुआ को बांग्लादेश में दोबारा स्थापित करने की कोशिश भी कर रहा है।

शर्मा के अनुसार, बांग्लादेश का झुकाव पाकिस्तान की ओर साफ दिखाई दे रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि पिछले साल पाकिस्तानी सैन्य और खुफिया अधिकारियों ने चार उच्चस्तरीय दौरे ढाका के किए। शेख हसीना के सत्ता से हटने के बाद से यूनुस सरकार पाकिस्तान के साथ राजनीतिक और कूटनीतिक संबंधों को गहरा करने में जुटी हुई है।


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