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भारतीय मूल के अमेरिकी जज ने ट्रंप के ग्रीन कार्ड फ्रीज पर रोक लगाई

जज मेहता ने फैसला सुनाया कि विदेश विभाग ने असल में वह भूमिका अपने हाथ में ले ली थी जो कांग्रेस ने अलग-अलग कांसुलर अधिकारियों को सौंपी गई थी।

 अमित मेहता  अमित मेहता / WIKIPEDIA

भारतीय मूल के फेडरल जज अमित मेहता ने फैसला सुनाया है कि ट्रम्प प्रशासन की वह पॉलिसी गैर-कानूनी है जिसके तहत 75 देशों के आवेदकों के सरकारी सुविधाओं पर निर्भर होने की आशंका के चलते कुछ ग्रीन कार्ड आवेदनों को रोक दिया गया था। इस फेसले से स्टेट डिपार्टमेंट के इमिग्रेशन स्क्रीनिंग उपायों को झटका लगा है।

31 जुलाई के एक फेसले में, डिस्ट्रिक्ट ऑफ कोलंबिया के U.S. डिस्ट्रिक्ट कोर्ट के जज मेहता ने कहा कि सेक्रेटरी ऑफ स्टेट मार्को रुबियो द्वारा जारी 'पब्लिक चार्ज पॉलिसी' (सरकारी सुविधाओं पर निर्भरता से जुड़ी नीति) का इस्तेमाल करना उस अधिकार का प्रयोग है जिसे कांग्रेस ने 'इमिग्रेशन एंड नेशनैलिटी एक्ट' में साफ तौर पर मना किया था।

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इस पॉलिसी के कारण नाइजीरिया, कोलंबिया, रूस और मिस्र समेत लगभग 75 देशों के नागरिकों के इमिग्रेंट वीजा आवेदनों, खासकर परिवार-आधारित याचिकाओं और कुछ रोजगार-आधारित ग्रीन कार्ड मामलों, में देरी हुई है या उन्हें रोक दिया गया है। इसकी वजह यह चिंता थी कि आवेदक अमेरिका में सरकारी मदद पर निर्भर हो सकते हैं।

यह मामला ब्राजील के नागरिक न्यूटन डी मौरा गोम्स ने दायर किया था, जो EB-5 इन्वेस्टर वीजा प्रोग्राम के जरिए स्थायी निवास (परमानेंट रेजिडेंसी) पाना चाहते थे। गोम्स ने मई में स्टेट डिपार्टमेंट पर मुकदमा किया था। उन्होंने आरोप लगाया था कि यह पॉलिसी 'एडमिनिस्ट्रेटिव प्रोसीजर एक्ट' का उल्लंघन करती है क्योंकि इसने गैर-कानूनी तरीके से उनके वीज़ा आवेदन पर फ़ैसला रोक दिया और फ़ेडरल कानून के उलट एक पॉलिसी लागू की।

EB-5 इन्वेस्टर वीजा प्रोग्राम के तहत, कोई गैर-नागरिक अमेरिका में नौकरियां पैदा करने वाले तय कमर्शियल उद्यमों में निवेश करके स्थायी निवास हासिल कर सकता है। जज मेहता ने फैसला सुनाया कि स्टेट डिपार्टमेंट ने असल में वह भूमिका अपने हाथ में ले ली थी जो कांग्रेस ने अलग-अलग कॉन्सुलर अधिकारियों को सौंपी थी।

उन्होंने लिखा कि यह पॉलिसी साफ तौर पर अलग-अलग आवेदनों पर कॉन्सुलर अधिकारियों के विवेकाधीन अधिकार को खत्म करती है। मेहता ने यह भी पाया कि 'कॉन्सुलर नॉन-रिव्यूएबिलिटी' का सिद्धांत (जो आम तौर पर ऐसे फैसलों को न्यायिक समीक्षा से बचाता है) इस मामले पर विचार करने से नहीं रोकता, क्योंकि इसमें स्टेट डिपार्टमेंट की पॉलिसी को चुनौती दी गई थी।

उनके आदेश ने स्टेट डिपार्टमेंट को डी मौरा गोम्स के वीजा अनुरोध पर 'पब्लिक चार्ज पॉलिसी' लागू करने से रोक दिया और आदेश दिया कि जब कॉन्सुलर अधिकारी उनके आवेदन को पूरा मान लें, तो उस पर फैसला किया जाए।

फैसले में कहा गया कि अदालत प्रतिवादियों को यह भी आदेश देती है कि वे INA और लागू नियमों के तहत वादी के आवेदन पर व्यक्तिगत आधार पर दोबारा फैसला करें। यह प्रक्रिया कॉन्सुलर अधिकारी द्वारा आवेदन को पूरा माने जाने के 60 दिनों के भीतर पूरी होनी चाहिए।

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