भारत और स्कॉटलैंड के विश्वविद्यालय गुरु ग्रंथ साहिब की 300 साल पुरानी पांडुलिपि के दर्शन की सुविधा देने पर चर्चा कर रहे हैं। / X/@IndiaInScotland
स्कॉटलैंड में भारतीय वाणिज्य दूतावास की एक टीम ने मंगलवार को एडिनबर्ग विश्वविद्यालय के अधिकारियों और एडिनबर्ग व ग्लासगो के गुरुद्वारा प्रतिनिधियों के साथ बैठक की। इस बैठक का उद्देश्य 300 साल पुराने गुरु ग्रंथ साहिब की पांडुलिपि के दर्शन की व्यवस्था को सुगम बनाना था।
एडिनबर्ग स्थित भारतीय वाणिज्य दूतावास ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म 'एक्स' पर लिखा, “टीम ने एडिनबर्ग और ग्लासगो के गुरुद्वारा प्रतिनिधियों-सिख संजोग की तृष्णा सिंह और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के अधिकारियों के साथ एक समन्वय बैठक में हिस्सा लिया। इसका उद्देश्य सेंट्रल गुरुद्वारा, ग्लासगो में श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महाराज के 300 साल पुराने हस्तलिखित स्वरूप के दर्शन की व्यवस्था करना था।”
यह पांडुलिपि साल 2020 में यूनिवर्सिटी के अभिलेखागार में मिली थी। इसके बाद इसके लंबे समय तक संरक्षण और देखभाल का काम किया गया।
भारतीय वाणिज्य दूतावास ने कहा, “यह पवित्र पांडुलिपि 2020 में यूनिवर्सिटी के अभिलेखागार में मिली थी। यह पहले पंजाब के महाराजा खड़क सिंह की थी। इसकी अच्छी तरह मरम्मत और संरक्षण किया गया है। यह हमारी साझा विरासत को संभालने और उसका सम्मान करने की दिशा में एक अहम कदम है।”
इस हस्तलिखित स्वरूप को पहली बार पिछले नवंबर में एडिनबर्ग के गुरु नानक गुरुद्वारा में आम लोगों के दर्शन के लिए रखा गया था। दूतावास ने 'एक्स' पर लिखा, “वाणिज्य दूत के लिए यह सम्मान की बात थी कि उन्होंने गुरु नानक गुरुद्वारा, एडिनबर्ग में समुदाय के लोगों के साथ मिलकर श्री गुरु ग्रंथ साहिब जी महाराज के 300 साल पुराने हस्तलिखित स्वरूप की पहली सार्वजनिक प्रस्तुति में हिस्सा लिया।”
दूतावास ने कहा, “यह आस्था, विरासत और समुदाय को जोड़ने वाला एक यादगार पल था। एडिनबर्ग गुरुद्वारा, सिख संजोग और यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग का धन्यवाद, जिन्होंने इसे संभव बनाया। दूतावास स्कॉटलैंड में सिख समुदाय को सांस्कृतिक, विरासत और सामुदायिक सेवाओं के जरिए लगातार सहयोग देता रहेगा।”
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग के अनुसार, श्री गुरु ग्रंथ साहिब वहां सुरक्षित रखे गए तीन सिख धर्मग्रंथों में से एक है।
यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबर्ग की कॉर्पोरेट कम्युनिकेशंस मैनेजर जेराल्डिन डिक ने 25 नवंबर 2025 को प्रकाशित एक लेख में लिखा, “यह स्वरूप पहले सिख साम्राज्य के दूसरे महाराजा, खड़क सिंह, के पास था। 1848 में भारत के दुल्लेवाला किले पर कब्जे के दौरान इसे वहां से ले जाया गया। बाद में सर जॉन स्पेंसर लोगिन ने इन धर्मग्रंथों को यूनिवर्सिटी को दान कर दिया। वही शख्स कोहिनूर हीरे को भी महारानी विक्टोरिया के पास लेकर गए थे।”
हालांकि इन धर्मग्रंथों को यूनिवर्सिटी में आए हुए 175 साल से भी ज्यादा समय हो चुका है, लेकिन इनके इतिहास और महत्व के बारे में विस्तार से जानकारी जुटाने की कोशिशें साल 2020 में ही शुरू हुईं।
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