सांकेतिक चित्र / Tapasya Chaubey
हर यात्रा अपने आप में एक सीख होती है और हमारी पोर्टलैंड की यात्रा तो एक रोलर कॉस्टर राइड जैसी रही। जैसा कि पीछे लेख में लिख चुकी हूं कि हमारी कनेक्टिंग फ्लाइट शिकागो में डिले हो गई थी और वह भी तीन घंटे से बढ़कर पांच के करीब। बच्चों के साथ एयरपोर्ट पर लंबा ब्रेक थका देने वाला होता। खैर हम देर रात करीब तीन बजे के आस-पास पोर्टलैंड एयरपोर्ट पहुंचे। फ्लाइट में सिर्फ स्नेक्स मिला था और भूख लग कर खत्म हो चुकी थी। पोर्टलैंड एयरपोर्ट छोटा सा है। आधी रात के इस पहर गिन कर कुछ दुकानें खुली थीं। हमारी इस आखिरी फ्लाइट के बाद एयरपोर्ट बंद होने वाला था। मालूम हुआ यहां एयरपोर्ट डेढ़ बजे रात तक ही खुला रहता है और सुबह 5 बजे ओपन होता है।
हमें इससे क्या ? अब तो हम पहुंच चुके थे। बच्चे आधी नींद में। खाने का फटाफट कुछ देखा पर वेज कुछ मिला नहीं। ऐसे में झल्ला कर मैंने कहा- गोली मारो खाने को और जल्दी पहुंचो होटल ताकि पूरे दिन की थकान मिटे। सुबह अच्छे से ब्रेकफास्ट करेंगे। कल का दिन पूरा पैक्ड है। यही सब बातें करते हुए हम एयरपोर्ट से सटे कार रेंटल तक पहुंचे। होटल, कार हमने तीन महीने पहले बुक कर ली थी। पर यहां एक नई परेशानी हमारा स्वागत कर रही थी। कार रेंटल का काउंटर बंद हो चुका था। यह अब सुबह 6 बजे ही खुलेगा। हम परेशान कि अब क्या करें? बड़ा बेटा उनींदे ही एयरपोर्ट की लॉबी में चलते-चलते पूरी तरह जाग गया था। उसने जब नोटिस पढ़ा कि सुबह छह बजे काउंटर खुलेगा, रोने को हो आया कि अब क्या करेंगे? साथी ने उसे हिम्मत दी, परेशान क्यों हो मैं देखता हूं कोई हो तो पूछूं कारण रेंटल कंपनी वाले कॉल भी नहीं पिक कर रहे थे। ऑटोमेटेड कॉल अंसर हो रहा था कि सुबह छह बजे काउंटर खुलेगा। वहीं हमने देखा की एक दूसरी इकलौती कार रेंटल का काउंटर खुला था। हमने उनसे बात की कि कोई कार हो तो दे सकतें हैं? उनका जबाब था-नहीं सर, कार लिमिटेड ही यहां होती हैं। जो पहले से बुक होती हैं।
इन सब में हमने करीब चार बजा दिए। अब दुविधा यह कि ऊबर किया जाए या नहीं। उबर करने के दो कारण। एक तो बच्चे पैनिक हो रहे थे और दूसरा कि होटल पहुंच कर आराम कर सकते थें। वहीं न करने के तीन कारण तत्काल दिख रहें थे। ऊबर यहां आने को 47 मिनट दिखा रही थी। ऐसे में क़रीब आधे घंटे दूर होटल पहुंचते-पहुंचते सुबह के साढ़े पांच से ऊपर। फिर सुबह यहीं आना होता कार लेने। कारण हमने कार 8 दिनों के लिए बुक की थी। होटल से वापस यहां आना फिर आगे की यात्रा में जाने में डेढ़ घंटा अधिक ड्राइव करना पड़ता। अब तक हम दंपती भी दम भरने लगे। तय किया कि करीब तीन घंटे यहीं काट लिया जाए। हम एयरपोर्ट की लॉबी की तरफ बढ़े। पर एक बार निकलने के बाद आगे का रास्ता कुछ दूर जा कर बंद हो गया था। वह अब सुबह ही खुलेगा। गनीमत यह कि इस इंडोर रास्ते के दोनों तरफ कुर्सियां लगी थीं। तब से चलते-खड़े रहते हम और थक गए थे। मैंने कहा- पहले कुछ देर यहां बैठते हैं फिर सोचते हैं कि किधर चला जाए।
अमेरिका में इतना घूमने के बाद भी यह पहला ऐसा अनुभव रहा हमारा। शांत स्वभाव वाले साथी भी अपना धीरज खो चुके थे। कुर्सी पर बैठते ही ऊबर फिर से देखने लगी। इस बार ऊबर हमसे डेढ़ घंटे की दूरी पर थी। मैंने तसल्ली देते हुए कहा कि ज्यादा सोच-विचार न किया जाए। यहीं सोते हैं और सुबह कार लेकर होटल पहुंचते हैं। ब्रेकफास्ट करके आराम से सोएंगे। दिन के कुछ प्लान कैंसिल कर दिए जाएंगे। हम्म के साथ साथी ने, चेयर पर सिर टिका लिया।
एक तो भोर से पहले का समय। दूसरा एयरपोर्ट का एसी इतना तेज कि हमें ठंड लग रही थी। गनीमत यह कि मैं हर यात्रा पर बच्चों के लिए दो थ्रो रखती हूं। कई बार फ्लाइट में टेंपरेचर बहुत कम होता है। उन्हीं छोटे कम्बलों में हमने दो-दो करके कैसे भी अपने आप को ढंका। पर चेयर पर बड़े अनकंफर्टेबल पोजिशन में। मैंने एक थ्रो दीवार और हमारे चेयर के बीच की जगह में बिछा दी। छोटा बेटा तो नींद में था वह लेट गया पर बड़े को शर्म आ रही थी। वह बार-बार कह रहा था- मैं ऐसे नहीं सो सकता। ऐसे कोई नहीं सोता यहां। यह कहते हुए वह लगभग रोआंसा हो उठा था। मेरे साथी बच्चे को ऐसा देख ग्लानि से भर उठे कि ओह! वह पहला ऊबर कर लेना था। कल जो होता वो देखते।
किसी तरह मैंने बेटे को समझाकर नीचे सुलाया और ऊपर से दूसरा थ्रो ओढ़ा दिया। हम दंपती वैसे ही चेयर पर बैठे सोने की कोशिश कर रहे थे पर इतनी ठंड में नींद कैसे आती? यहां के मौसम के हिसाब से हमने जैकेट साथ रखा था। सामान खोल कर जैकेट निकाला गया और पहना गया। मेरे साथी बीच-बीच में समय देखते रहते और कार रेंटल कंपनी को कोसते रहे।
इधर मेरा बड़ा बेटा हल्की आवाज पर भी उठ बैठता। वह असहज हो रहा था। उसे लग रहा था यहां ऐसे कोई नहीं करता। मेरे साथी पहली बार झल्ला कर उसके बगल में नीचे लेट गए- देखो पापा लेटे हैं और उसे समझाने लगे कि बेटा कई बार हमें ऐसे सिचुएशन के लिए भी तैयार रहना चाहिए। जरूरी नहीं हर बार महंगे होटल में ही सोएं। कभी समय पड़े तो नीचे सोने में भी नहीं झिझकना चाहिए।
बेटा रोते हुए बोल पड़ा- मुझे नीचे सोने से दिक्कत नहीं पर पब्लिक प्लेस पर ऐसे कौन सोता है? वी आर नोट होमलेस। उनकी यह बात सुनकर हम दोनों हंस पड़े। तुम्हें किसने कहा कि केवल होमलेस लोग ही ऐसे सोते हैं। हम लोग तो इंडिया में कई बार ट्रेन के इंतजार में ऐसे नीचे बैठे हैं। खूब मजे किए हैं। कुछ एक बार तो मच्छरों से भरे वेटिंग रूम में ऐसे चेयर पर सोए भी हैं। मैं आगे और कुछ उसे बताती कि बीच में बच्चे ने टोका- मॉम दिस इज नॉट इंडिया।
(क्रमश:)
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