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मुंशी प्रेमचंद जयंती : जीवन, जिजीविषा और संघर्ष के रचनाकार

लोग कहते हैं, जुलूस निकालने से क्या होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं, और मैदान से हटे नहीं हैं।

 प्रेमचंद ने कहा था- जो शिक्षा प्रणाली लड़के-लड़कियों को सामाजिक बुराई या अन्याय के खिलाफ लड़ना नहीं सिखाती गर तो उस शिक्षा में जरूर कोई न कोई बुनियादी खराबी है। प्रेमचंद ने कहा था- जो शिक्षा प्रणाली लड़के-लड़कियों को सामाजिक बुराई या अन्याय के खिलाफ लड़ना नहीं सिखाती गर तो उस शिक्षा में जरूर कोई न कोई बुनियादी खराबी है। / Tapasya Chaubey

हिंदी के उपन्यास सम्राट की उपाधि पाने वाले मुंशी प्रेमचंद का आज जन्मदिवस है। इनका जन्म 31 जुलाई, 1980 को वाराणसी के  लमही गांव में हुआ था। उनकी माता का नाम आनन्दी देवी तथा पिता का नाम मुंशी अजायबराय था।

प्रेमचंद का वास्तविक नाम धनपत राय श्रीवास्तव था। पढ़ाई में रुचि रखने वाले प्रेमचंद की प्राम्भिक  शिक्षा फारसी में हुई। दुखद संयोग रहा कि जब वे सात साल के थे, उनकी माता जी का स्वर्गवास हो गया। जैसे-तैसे ममताविहीन चाची की छाया में पलते रहे। जब वे पन्द्रह वर्ष के हुए तब उनका विवाह कर दिया गया। और फिर सोलह वर्ष की आयु में पिता का साया भी सिर से उठ गया।

 प्रारम्भिक जीवन प्रेमचंद का काफी संघर्षमय रहा। मां की मृत्यु, पण्डे-पुरोहित का कर्मकाण्ड, कम उम्र में शादी, दुखद वैवाहिक जीवन, गांव में किसानों और कार्यस्थल पर क्लर्कों का दुखी जीवन उन्हें नए-नए अनुभवों से भरता रहा।और यही सब उनके साहित्यिक जीवन का आधार बना। प्रेमचंद ने दूसरी शादी शिवरानी देवी से की। यह विवाह भी उस समय समाज के मुंह पर तमाचा था। शिवरानी देवी बाल-विधवा थीं। वे शिक्षित महिला थीं और प्रेमचंद के साथ कुछ आंदोलनों में भी भाग लिया। 

मुझे याद पड़ता है कि स्कूल में मिश्रा सर ने मुझे ईदगाह कहानी पढ़ने को कही थी। क्लास में इसे पढ़ते हुए मैं इस कहानी में यूं बह चली गई कि पहले गला रूंधा और फिर रोने लगी। बच्चे अवाक मुझे देख रहे थे, तो कुछ हंस रहे थे। मिश्रा जी ने डांटा। मेरे पास आकर बड़े दुलार से सिर पर हाथ फेरते हुए कहा- मुझे नहीं मालूम था की मेरी पटया मछरी ( मुझे प्यार से इसी नाम से पुकारते) इतनी भावुक भी है। 

मैं अपने आंसू भूल कर शर्म से लाल हो गई थी। सोमवार को जब मैं स्कूल पहुंची। हिंदी की क्लास पूरी होने के बाद मिश्रा जी मुझे बुलाया और एक पतली सी किताब मेरी तरफ की। यह लो पढ़ना। इस किताब में ईदगाह के साथ ठाकुर का कुआं, बड़े भाई, पूस की रात, दो बैलों की कथा और सद्गति आदि कहानियां थीं। 

ये कहानियां मेरे बाल मन को कभी चकित करती तो कभी रुलातीं। कभी सोचने को भी मजबूर करतीं। बाद के बरसों में मैंने कफन, गोदान, बड़े घर की बेटी, निर्मला, रंगभूमि, कर्मभूमि आदि पढ़ी। पढ़ते वक्त कभी इनके पात्रों पर क्रोध करती तो कभी प्रेम। कभी दया से भर उठती। इनकी रचनाएं इतनी मौलिक और असरदार होतीं कि मैं इन कहानी के पात्रों को अपने आस पास के जीवन में भी ढूंढ निकालती।

जैसे ईदगाह ने बचपन में मन पर असर किया था वही असर निर्मला को कॉलेज के दिनों में पढ़ कर हुआ। कॉलेज के दिनों में ही आर्ट सिनेमा भी दिमाग में बसने लगा था और तब देखा इनकी कहानी पर बनी फिल्म सद्गति और शतरंज के खिलाड़ी। क्या मार्मिक कहानी और क्या सुंदर फिल्मांकन।

8 अक्टूबर 1936 को प्रेमचंद का देहांत हो गया। देह का अंत हुआ लेकिन उनके विचार, उनकी कहानियां हमारे बीच आज भी हैं, सदा रहेंगी साहित्य की दुनिया में। वे हमे प्रेरणा देती रहेंगी मुश्किलों के दौर में। 

लोग कहते हैं, जुलूस निकालने से क्या होता है? इससे यह सिद्ध होता है कि हम जीवित हैं, अटल हैं, और मैदान से हटे नहीं हैं।

बकौल प्रेमचंद- जो शिक्षा प्रणाली लड़के-लड़कियों को सामाजिक बुराई या अन्याय के खिलाफ लड़ना नहीं सिखाती गर तो उस शिक्षा में जरूर कोई न कोई बुनियादी खराबी है।

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