राव बहादुर फिल्म का पोस्टर / Courtesy
साउथ सिनेमा इंडस्ट्री क्या कमाल की फिल्में बना रही है। उसमें भी मलयालम सिनेमा। पर इस बार तो मुझे तमिल की एक फिल्म ने चौंका दिया। सोच रही हूं, सिनेमा हॉल में ऐसी फिल्म देखने कितने तमिलवासी जाएंगे?
फिल्म का नाम राव बहादुर है। वैसे देखा जाये तो इस फिल्म की शुरुआती आधे घंटे कइयों को फिल्म छोड़ने पर मजबूर कर सकती है लेकिन अगर धीरज धर लिया तो क्या जादुई यथार्थ रचती है यह फिल्म। ऐसा लगता है जैसे कोई कहानी कोई सुना रहा हो। एक भुवनालयम नाम का महल था। उसके राजा थे, राव बहादुर।
फिल्म के शुरू के दृश्य में ही डॉ. नारायणचारी मरीज के मुंह के अंदर देखते हैं जो लग रहा है, कोई गुफा हो। जहां कई कहानियां दबी हों।
फिल्म पूरी रमप्पा राव बहादुर (सत्य देव ) के कंधों पर टिकी है, और क्या बेहतरीन ऐक्टर हैं ये। सत्य देव ने अपने हर करैक्टर को जैसे जीया है। एक उत्साही, विशेषाधिकारप्राप्त कुलीन वर्ग के किरदार से लेकर मानसिक रोग से जूझ रहे व्यक्ति के बीच सहजता से खुद को बदलते रहते हैं।
फ्लैशबैक में युवा राव को एक स्वतंत्र विचारों वाला व्यक्ति के रूप में दिखाया गया है। पहनावे और विचार में आप उन्हें लेनन से प्रेरित है मान सकते हैं। फिल्म में कई सामाजिक रूढ़ियों जैसे, जाति, रंग, शक, अहंकार और वंश परम्परा के अदृश्य बोझ को रूपक की तरह दिखाया गया है। यह सब कुछ एक हास्यास्पद नाट्यकला की तरह दर्शाया गया है। एक जगह राव एक नेता की मृत्यु की बात भी करते हैं पर न पार्टी का नाम लेते हैं न व्यक्ति की। पर आप समझ जाते हैं की किसकी बात हो रही है। यह फिल्म आपको उपदेश नहीं देती बस कहानियां कहती चलती जाती है।
इस फिल्म में रमप्पा राव को आप पसंद नहीं कर पाएंगे। न ही इस फिल्म का सस्पेंस अंत तक ठीक-ठीक गेस कर पायेंगे। फिल्म का अंत होगा। आपका भी मुंह वैसा ही खुला होगा जैसे फिल्म के पहले दृश्य में मरीज का दिखाया गया था। और इसी के साथ आप इस फिल्म के राइटर- डायरेक्टर, वेंकटेश महा को धन्यवाद कहेंगे।
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